Petrol-Diesel Price Impact: दाल से ढुलाई तक बढ़ी महंगाई, चना-अरहर के दामों ने बिगाड़ा हर घर का बजट

Petrol-Diesel Price Impact: बढ़ती ईंधन कीमतों, कमजोर मानसून और कम आयात के कारण चना-अरहर समेत कई दालों के दाम बढ़ रहे हैं। जानिए कैसे महंगाई का असर आपकी रसोई और रोजमर्रा के खर्च पर पड़ सकता है।
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Petrol-Diesel Price Impact: देश में बढ़ती महंगाई अब सीधे आम लोगों की रसोई पर असर डाल रही है। चना और अरहर जैसी जरूरी दालों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। दूसरी ओर पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों ने माल ढुलाई को महंगा कर दिया है, जिसका असर खाने-पीने की वस्तुओं समेत रोजमर्रा के सामान पर पड़ने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है, जिससे घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

कम आयात से महंगी हुई दालें

  • कुल दाल आयात घटकर 57.76 लाख टन रह गया।
  • पिछले वित्त वर्ष में दाल आयात 69.3 लाख टन था।
  • चना और अरहर की बाजार आवक कमजोर बनी हुई है।
  • चने के आयात में करीब 5 लाख टन की कमी आई।
  • मसूर और मटर के आयात में भी गिरावट दर्ज हुई।
  • सप्लाई कम होने से दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ा।

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अरहर, उड़द और मसूर में तेजी का माहौल

बीते एक महीने में अरहर, उड़द, मसूर और देसी चना समेत कई दालों के दाम तेजी से बढ़े हैं। मंडियों में पुरानी अरहर का स्टॉक भी सीमित रह गया है, जिससे कीमतों में और तेजी आ रही है। सरकार ने अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर 8450 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। इससे किसानों को फायदा मिलने की उम्मीद है, लेकिन बाजार में दालों की कीमतें और ऊपर जाने की आशंका भी बढ़ गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर सप्लाई में सुधार नहीं हुआ तो आने वाले समय में दालें और महंगी हो सकती हैं।

कमजोर मानसून से बढ़ी महंगाई की चिंता

मौसम वैज्ञानिकों ने इस साल अल-नीनो के असर के कारण सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो खरीफ सीजन में अरहर जैसी फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। इससे उत्पादन घटेगा और बाजार में कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश की कमी का असर सिर्फ दालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सब्जियों और दूसरी कृषि उपज की कीमतों में भी तेजी आ सकती है। यही वजह है कि बाजार में अभी से महंगाई के नए दौर की चर्चा शुरू हो गई है।

डीजल महंगा होने से बढ़ी माल ढुलाई लागत

डीजल की बढ़ती कीमतों और कई इलाकों में ईंधन की कमी ने ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर दबाव बढ़ा दिया है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के मुताबिक, कई राज्यों में करीब 20 फीसदी ट्रक सड़कों से हट गए हैं। इससे माल ढुलाई की लागत 10 से 15 फीसदी तक बढ़ गई है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने का सीधा असर किराना, फल-सब्जी और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ रहा है। व्यापारी अब बढ़े हुए खर्च को ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है।

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ऑटो सेक्टर में भी बढ़ रही लागत

महंगाई का असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भी साफ दिखाई दे रहा है। टायर और वाहन पुर्जा बनाने वाली कंपनियों ने उत्पादन लागत बढ़ने का हवाला देते हुए कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं। कंपनियों का कहना है कि कच्चे माल और ऊर्जा लागत में लगातार इजाफा हो रहा है। सिएट के प्रबंध निदेशक अर्णव बनर्जी के मुताबिक, कंपनी मार्च और अप्रैल में टायरों के दाम करीब पांच फीसदी बढ़ा चुकी है और आने वाले महीनों में एक और बढ़ोतरी संभव है। इससे ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों की लागत और बढ़ेगी, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

आम आदमी की जेब पर बढ़ेगा दबाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दालों की सप्लाई स्थिति में सुधार नहीं हुआ और ईंधन की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो आने वाले महीनों में महंगाई और तेज हो सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ेगा, जिनकी मासिक रसोई लागत लगातार बढ़ रही है। फिलहाल बाजार और उपभोक्ता दोनों मानसून और सरकारी कदमों पर नजर बनाए हुए हैं।

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