E85 फ्यूल आखिर है क्या? E85 फ्यूल कैसे बदल सकता है आपकी ड्राइविंग, जानिए E85 फ्यूल की पूरी सच्चाई

E85 Fuel भारत में स्वच्छ परिवहन की दिशा में एक नया कदम है। जानिए E85 Fuel क्या है, Flex-Fuel Vehicles कैसे काम करती हैं, इसके प्रमुख फायदे, चुनौतियां और देश की अर्थव्यवस्था पर इसका संभावित प्रभाव।

E85 Fuel Flex Fuel Vehicles: विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) के अवसर पर दिल्ली में E85 फ्यूल की शुरुआत की गई। फिलहाल इसे 48 आउटलेट्स पर उपलब्ध कराया गया है। सरकार की योजना दिसंबर 2026 तक 500 और दिसंबर 2027 तक 5,000 आउटलेट्स तक इसका विस्तार करने की है। इसका उद्देश्य आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करना और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना है।

क्या है E85 Fuel और Ethanol Blending

E85 एक हाई एथेनॉल बायोफ्यूल मिश्रण है, जिसमें 80 से 85 प्रतिशत एथेनॉल और 14 से 19 प्रतिशत पेट्रोल शामिल होता है। ईंधन में एथेनॉल की मात्रा को ‘E’ से दर्शाया जाता है। उदाहरण के लिए E20 में 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। भारत में पहले से E20 उपलब्ध है और अब अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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कैसे काम करती हैं Flex-Fuel Vehicles

फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (FFV) ऐसे इंटरनल कंबशन इंजन से लैस होती हैं जो पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग मिश्रण पर चल सकती हैं। इनमें लगा फ्यूल कंपोजिशन सेंसर ईंधन में एथेनॉल की मात्रा पहचानकर इंजन कंट्रोल यूनिट (ECU) को जानकारी भेजता है। इसके बाद ECU फ्यूल इंजेक्शन और स्पार्क टाइमिंग को स्वतः एडजस्ट कर इंजन की परफॉर्मेंस को संतुलित बनाए रखता है। यही वजह है कि ये वाहन E20 से लेकर E85 और विशेष परिस्थितियों में E100 तक के मिश्रण पर चल सकते हैं।

देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए महत्व

एथेनॉल का उत्पादन गन्ना, मक्का और बायोमास जैसे कृषि उत्पादों से किया जा सकता है। इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के साथ किसानों के लिए आय के नए अवसर भी बन सकते हैं। ब्राजील में यह तकनीक पहले से सफल रही है, जहां अधिकांश हल्के वाहन हाई एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलते हैं। भारत में भी इसे स्वच्छ और टिकाऊ परिवहन विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

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फायदे के साथ मौजूद हैं चुनौतियां

फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक कई संभावनाएं लेकर आई है, लेकिन इसकी कुछ चुनौतियां भी हैं। एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होने के कारण अधिक ब्लेंडिंग पर माइलेज प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा अभी फ्यूल स्टेशन नेटवर्क सीमित है और फ्लेक्स-फ्यूल कारों व बाइकों का बड़े पैमाने पर उत्पादन भी शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में व्यापक उपलब्धता और पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होना इस तकनीक के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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