March 30, 2026
होली 2026 की सही तारीख और होलिका दहन मुहूर्त।

वर्ष 2026 में 4 मार्च को खेली जाएगी रंगों की होली। (Image - Unsplash)

Kab Hai Holi 2026: वर्ष 2026 में होली की तारीख को लेकर बना संशय अब समाप्त हो गया है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस साल रंगों की होली 4 मार्च, बुधवार को खेली जाएगी।

Holi 2026 Date News: रंगों का महापर्व होली हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, लेकिन वर्ष 2026 में तिथियों के फेर और खगोलीय घटनाओं के कारण भक्तों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

आमतौर पर होलिका दहन के अगले दिन ही रंग वाली होली (धुलेंडी) खेली जाती है, परंतु इस बार कैलेंडर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पंचांग और वरिष्ठ ज्योतिषाचार्यों की गणना के अनुसार, इस साल रंगों की होली 3 मार्च के बजाय 4 मार्च 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। वहीं, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होलिका दहन 2 मार्च, सोमवार की रात को संपन्न होगा।

3 मार्च को रंग न खेलने का मुख्य कारण: चंद्र ग्रहण

3 मार्च को रंग न खेलने का मुख्य कारण: चंद्र ग्रहण

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, 3 मार्च 2026 को साल का पहला पूर्ण चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। हिंदू धर्मशास्त्रों में ग्रहण काल और उसके सूतक काल को बेहद संवेदनशील माना जाता है। सूतक काल के दौरान किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य, पूजा-पाठ और सार्वजनिक उत्सव वर्जित होते हैं।

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चूंकि रंग खेलना एक मंगलमय और उल्लासपूर्ण गतिविधि है, इसलिए ग्रहण के साये में इसे मनाना शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है। इसी कारण विद्वानों ने निर्णय लिया है कि सूतक और ग्रहण की समाप्ति के बाद ही, यानी 4 मार्च को रंगोत्सव मनाया जाना शुभ रहेगा।

होलिका दहन पर भद्रा काल का साया और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में होलिका दहन के समय भद्रा काल का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य होगा। 2 मार्च की शाम से ही भद्रा का प्रभाव शुरू हो जाएगा, जो 3 मार्च की सुबह 4:56 बजे तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल में होलिका दहन करने से विघ्न-बाधाएं आने की आशंका रहती है।

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ज्योतिषाचार्य डॉ. एन. के. बेरा के अनुसार, भक्तों को भद्रा समाप्ति के बाद या भद्रा पुच्छ काल में ही दहन की प्रक्रिया संपन्न करनी चाहिए। देर रात भद्रा दोष मुक्त समय में किया गया दहन ही परिवार और समाज के लिए सुख-समृद्धि लेकर आता है।

पौराणिक कथा और पर्व का आध्यात्मिक महत्व

पौराणिक कथा और पर्व का आध्यात्मिक महत्व

होली का त्योहार केवल रंगों का खेल नहीं है, बल्कि यह असुरराज हिरण्यकश्यप के अहंकार पर भक्त प्रह्लाद की भक्ति की विजय का उत्सव है। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त प्रह्लाद को जलाने की कोशिश में खुद होलिका अग्नि में भस्म हो गई थी। यही कारण है कि फाल्गुन पूर्णिमा की रात को होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है।

यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और विश्वास की शक्ति के सामने बड़ी से बड़ी आसुरी शक्तियां भी परास्त हो जाती हैं। 2026 में यह संदेश और भी गहरा हो जाता है क्योंकि भक्त संयम (ग्रहण) के बाद उत्सव (होली) मनाएंगे।

सूतक काल के नियम और सावधानी

3 मार्च को लगने वाले चंद्र ग्रहण के कारण मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे। सूतक काल ग्रहण शुरू होने से लगभग 9 घंटे पहले प्रभावी हो जाता है। इस दौरान भोजन बनाने, मूर्ति स्पर्श करने और शुभ कार्यों की मनाही होती है।

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4 मार्च की सुबह जब सूर्योदय होगा, तब पवित्र स्नान और दान के बाद रंगों का त्योहार पूरी उमंग के साथ शुरू होगा। बुधवार का दिन होने के कारण यह होली और भी विशेष मानी जा रही है, क्योंकि बुध ग्रह को बुद्धि और वाणी का कारक माना जाता है, जिससे आपसी संवाद और सौहार्द बढ़ेगा।

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